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शुक्रवार, 28 मार्च 2014

लालकिले से (भाग-19) - कांग्रेस विरोधी लहर से कांग्रेस को ही फायदा, वोटों के बंटने से पूर्व और दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस विरोधी लहर का असर कम



मोदी ने अपने तूफानी प्रचार से देश भर में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना दिया है लेकिन वे कांग्रेस विरोधी वोट को एक करने में फिलहाल तक नाकाम नजर आ रहे हैं। इससे कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस को फायदा हो रहा है। २०१४ के लोकसभा चुनाव से पहले आए तीन प्री पोल सर्वे में सीट के नंबरों को छोडक़र अगर उसके संदेश को पढ़ा जाय तो ये बातें सामने आती हैं। ये सर्वे सी वोटर, सीएसडीएस और नीलसन ने किए हैं।
हिन्दी बेल्ट को छोडक़र इसका सीधा फायदा तीसरे मोर्चे और क्षेत्रीय दलों को हो रहा है। लेकिन ममता, बीजू और जयललिता स्वीप करने की स्थिति में नहीं हैं। यही कांग्रेस का सबसे बड़ा फायदा है। इसके विपरीत महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना- आरपीआई- शेतकारी संगठन के महाजोत के कारण कांग्रेस- राकपां के हालात काफी खराब हैं। अभी इस महाजोत में मनसे को भी जोडऩे की कवायद चल रही है। हिन्दी, मराठी और गुजराती बेल्ट में कांग्रेस का सूपडा साफ है। हर जगह कांग्रेस २ से ४ सीटों के बीच सिमट रही है। यूपी में भाजपा ५० सीटों तक ला सकती है। आप यूपी में भाजपा के ४ फीसदी वोट काट रही है। इससे आप पार्टी को तो फायदा नहीं हो रहा है पर भापा को दस सीओं का नुकसान हो रहा है। अभी यूपी को भाजपा में ३२ फीसदी वोट आ रहे हैं। अगर उसके ये वोट ३६ फीसदी हो जाते हैं तो यह ५८ सीटों के अपने पुराने रिकार्ड या उससे भी आगे पहुंच सकती है।

कांग्रेस विरोध की हवा ऐसे हो रही है कमजोर

. पश्चिमी बंगाल (कुल सीटे -४२)।  ममता अच्छा कर रही हैं।  प्री पोल सर्वे में उन्हे २३ तक सीटें मिल रही हैं। भाजपा को २ से ३ सीटें मिल रही हैं। बाकी १७ सीटें वामपंथियों और कांग्रेस को मिल रही  हैं। ममता चूंकि काफी पहले यूपीए से बाहर हो गई थीं इसलिए उन्हें नुकसान नहीं है। पर भाजपा से उनका गठबंधन नहीं हुआ है इसलिए भाजपा से २० फीसदी वोटों का उन्हें फायदा नहीं मिल पा रहा है। मुस्लिम वोटों के कारण ममता भाजपा से गठबंधन नहीं कर रही हैं। अगर तीसरे मोर्चे की संभावना बनी तो ये १७ सीटें भाजपा के खिलाफ जाएंगी।
मतलब-  कांग्रेस विरोधी लहर होने के बाद भी ममता स्वीप नहीं कर रहीं। वामपंथियों और कांग्रेस को फायदा।
२.बिहार (कुल सीटे -४०)।  भाजपा से जदयू के अलग होने से भाजपा को तो सीटों का फायदा हो रहा है पर जदयू की सीटें कम हो रही है। जेडीयू को ४ से ८ सीटें और भाजपा को २५ सीटों का अनुमान है। दोनों के वोट बंटने जहां भाजपा की सीटें बढऩे के बजाय एडीए की सीटें कम हो रही हैं। कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद लालू और कांग्रेस मिलकर १५ सीटें ले जाते नजर आ रहे हैं। यानी कांग्रेस विरोधी लहर में लालू और कांग्रेस १५ सीटें ले जाएं यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
मतलब -  वोटों के बिखराव का सीधा सा फायदा यहां कांग्रेस और सहयोगियों को।
३.उड़ीसा (कुल सीटे -२१)।  यहां भी बंगाल जैसे हालात है। बीजू पटनायक को १३ सीटे मिल सकती हैं। यहां कांग्रेस भी आधा दर्जन सीटें ले जाने की स्थिति में है। भ्भाजपा का २२ फीसदी वोट अलग होने से बीजू जनता दल स्वीप करने की स्थिति में नहीं है। यहां कांग्रेस आधा दर्जन सीटें ले जा रही है।
मतलब -  वोटों के बिखराव का सीधा सा फायदा यहां कांग्रेस को।
४.आंध्रप्रदेश (कुल सीटे -४२)।  आंध्र ही एक ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस विरोधी वोट बंटने के बाद भी कांग्रेस को फायदा नहीं हो रहा है। यहां का सारा वोट वायएसआर कांग्रेस, तेलुगुदेशम, और टीएसआर में आंध्र और तेंलगाना के मुद़दे  पर बंट रहा है। यहां वाएसआर कांग्रेस को १५ से २०, तेलुगुदेशम को ८, टीआरएस को १३ से १५, यहां भ्भी कांग्रेस को ५ सीटें और भाजपा केा ०से२ सीटों का अनुमान है। यहां पूरी राजनीति दो हिस्सों में बंट गई हैे। एक ओर हैं वायएसआर कांग्रेस और तेलुगुदेश और दूसरी ओर तेलंगाना राष्ट्र समिति। एक आंध्र की हिमायती दूसरी तेलंगाना की पक्षधर। कांग्रेस  यहां अधोषित रूप से टीआरएस के साथ है। पूरे आंध्र में खराब हाल से बचने के लिए ही कांग्रेस ने अलग तेलंगाना  के बिल का नाटक किया था। वायएसआर सीमान्ध्र तो टीआरएस तेलंगाना में अच्छा कर रही है। तेलुगुदेशम दोनों क्षेत्रों में अच्छा कर रही है। यहां भाजपा का १७ फीसदी वोट अगर किसी से जुड़ जाए तो कांग्रेस को मुश्किलें हो सकती हैं।
मतलब -  अगर तेलंगाना का मुद्दा नहीं होता तो वायआरएस कांग्रेस पूरे आन्ध्र में अच्छा करती। अब तेलंगाना के मुद्दे पर टीआएस आगे है। कांग्रेस को ये पता है कि भाजपा अगर वायआरएस और टीडीपी के साथ जाती है तो वह टीआरएस के साथ नहीं जा पाएगी और टीआरएस के साथ जाती है तो वह वायआरएस के साथ नहीं जा पाएगी। यानी यहां ४२ में से २० सीटों पर कांग्रेस और सहयोगी टीआरएस के लिए अच्छी ख्खबर है। कांग्रेस विरोधी लहर में२० सीटें काफी हैं।
५. कर्नाटक (कुल सीटे -२८)।  यहां कर्नाटक ही देश का एकमात्र ऐसा राज्य है कि जहां सत्ता विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस टक्कर में है और पिछली बार से दोगुनी सीटें ले जाएगी। यहां दोनों पार्टियों को १२-१३सीटों का अनुमान है। जेडीएय को ३ सीटों का अनुमान है। माना जा रहा है कि येदुरप्पा की वापसी से भाजपा को कुछ फायदा है पर पिछले चुनाव की तुलना में उसे ६ सीटों का नुकसान होगा।
मतलब -  विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस की सीटें दोगुनी हो रही हैं और येदुरप्पा की वापसी से कांग्रेस की संभावित बढ़त रूक गई है।
६. तमिलनाड (कुल सीटे -३९)।  यहां जयललिता की एआईडीएम के १५ से २९ सीटों तक का अनुमान है। यहां डीएमके और कांगे्रस को भी १० से १४ सीटों का अनुमान है। यहां भी भजपा को १७ फीसदी वोट जा रहा है।
मतलब -  यहां जयललिता के पक्ष ३९ में से ३५ सीटों लाने वाला स्वीप नहीं दिख रहा है। वोट बंटने से कांग्रेस और गठबंधन को अगर १० भी सीटें लि जाती हैं तो इस कांग्रेस विरोधी लहर में १० सीटें मायने रखती हैं।
७. केरल  (कुल सीटे -२०)।  केरल में एक सर्वे में यूडीएफ को आगे दिखा रहा है तो एक सर्वे एलडीएफ को। जिस तरह से देशभ्भर में कांग्रेस विरोधी लहर है उससे एलडीएफ को फायदे की ज्यादा संभावनाएं। भाजपा का वोट बढ़ा है पर सीट में तब्दील होने की संभावनाएं नहीं के बराबर है।
मतलब -  केरल में सीटें एलडीएफ और यूडीएफ में बंट जाएंगी। दोनों मेसे कोई भ्भी जीते वह भाजपा के साथ नहीं जाएगा। एलडीएफ जीता तो तीसरे मोर्चे की ताकत बढेगी। यूडीएफ तो कांग्रेस का ही गठबंधन है।  यानी दोनों सूरतों में कांग्रेस को फायदा।
निष्कर्ष- इन दिनों भाजपा के प्रवक्ता टीवी चैनलों में यह कहते नजर आते है कि कांग्रेस के विरोध मेंचल रहा वोट अगर भाजपा के अलाव किसी पाटी्र्र को दिया तो वह पीछे के दरवाजे से कांग्रेस के पास ही पहुंच जाएगा, इस बात में यह विश्लेषण लिखने के बाद मुझे दम नजर आने लगा है।



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